कोरोना काल में वो एक दिन


शरद को कलकत्ता से गाजियाबाद आए 12 दिन हुए थे। सरकारी क्वार्टर में क्वारंटाइन का दूसरा सप्ताह चल रहा था। शरद के बाबूजी श्री राजेश शर्मा दिन में दो बार फोन करके उसका हाल जानते थे। हर बार एक ही चेतावनी दी जाती थी। " देखो कुछ दिन बचे हैं इस अज्ञातवास में। घर आते ही तीसरे दिन शादी हो जानी है। किसी से ज्यादा मेलजोल करके वायरस ना ले बैठना।" शरद तो बस 'जी बाबूजी,जी बाबूजी' कहता रहता जैसे बहुत ही आज्ञाकारी लड़का है। बात खत्म करके शरद छत की तरफ सीढ़ियां चढ़ने लगा। बाहर घूमने की मनाही है लेकिन छत तो अपनी है। चलो! हल्की सी धूप ही ताप लेते हैं। आज छत का नजारा बाकी दिनों से कुछ अलग था। पीली साड़ी पहने एक अनजान लड़की अपने गीले बालों को सुखा रही थी। सुनहरी धूप में चमकती पीली साड़ी सरसों के सुहाने खेत से लग रहे थे। लंबे बाल जैसे गेहूं की पकी बालियां आपस में सर सर कर रही हो। " यह बला कौन है? इतने दिनों से तो यहां दिखाई नहीं दी।' शरद मन ही मन सोचने लगा। शरद की एकटक देखती निगाहों को अनजान लड़की ने भाप लिया। 
" क्या हुआ जनाब? अजीब शक्ल है क्या मेरी?"
" अरे नहीं नहीं! पहले कभी आपको देखा नहीं यहाँ इसलिए थोड़ा हैरान था।" शरद ने मुस्कुराकर कहा।
" हां मैं कल रात ही पुणे से आई हूं। होम क्वारंटाइन मांगा था। पता नहीं क्यों मुझे भी यहां डाल दिया? अब 2 हफ्ते सरकारी दाल खानी पड़ेगी।" दोनों खिलखिला कर हंसने लगे। शरद ने चिंता भरे भाव से कहा,"महाराष्ट्र में तो बहुत कोरोना फैला है। अच्छा हुआ जो वहां से निकल आए।"
सीढ़ियां उतरते हुए शरद को पता चला कि टॉप फ्लोर पर ही दोनों के अगल-बगल कमरे हैं। 
"मैं चाय बनाने जा रहा हूं कहो तो एक कप आपके लिए बना दूं?"
डेढ़ दिन ट्रेन में बिताने के बाद बनी बनाई चाय मिल जाए इससे अच्छा क्या होगा? खामोश रहकर अनजान लड़की ने हां कर दी।
इलेक्ट्रिक कैटल में चाय बनाते हुए शरद बिना पलक झपके निहारने लगा। वो छत,वो धूप,वो साड़ी और गीले बाल शरद की आंखों के सामने घूम रहे थे। अनजान लड़की कब उसके कमरे में आई और कैटल का स्विच निकाल दिया उसे पता ही नहीं चला। चाय की शिप लेते हुए और अनजान लड़की की आंखों में देखते हुए शरद उसकी बातें जरूर सुन रहा था। लेकिन वह किस बारे में बात कर रही है। कोई शब्द शरद के कानों तक नहीं पहुंच रहा था। चाय खत्म करके अनजान लड़की ने जाने की इजाजत मांगी। चाय का कप लेते हुए शरद उसका हाथ नहीं छोड़ रहा था। मानो कहना चाहता हो,"कहीं ना जाओ,यहीं रुक जाओ।"
एक मिनट पहले जहां दोनों के बीच एक मेज का फासला था। अब हवा तक उनके बीच से नहीं गुजर सकती थी। अनजान लड़की कुछ कह पाती उससे पहले शरद ने उसके मुख पर अपने होंठ रख दिए। लड़की भी शायद साथ देना चाहती थी। तभी उसे कोई ख्याल आया और छटपटाकर अपने रूम की तरफ भाग गई। दोपहर हो गई थी। शरद ने आराम करने की सोची। 
" उन्हें थोड़ा वक्त देते हैं। शाम को मिलेंगे। अरे! मैं ही पगला हूं। अभी तो नाम भी नहीं पूछा।" सोचते-सोचते शरद की आंख लग गई।
शाम हो चली थी। एंबुलेंस की टाएं-टाएं सुनते हुए शरद की आंख खुली। दरवाजा खोलकर शरद बाहर निकला तो दो आदमी बगल के कमरे में सैनिटाइजर का छिड़काव कर रहे थे। शरद बालकनी से नीचे खड़ी एंबुलेंस को देखने लगा। एंबुलेंस में बैठी अनजान लड़की इंतजार भरी निगाहों से ऊपर की ओर देख रही थी। दरवाजा फटाक से बंद करके ड्राइवर एंबुलेंस लेकर निकल गया। क्वारंटाइन,शादी और बाबूजी की सलाह शरद को अब सब याद आ गया था। सुबह फोन रखने से लेकर शाम तक दिन में देखा गया यह सपना शरद को बहुत भारी पड़ने वाला था।

                       "निर्जर"

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